Monday, July 2, 2012

कुछ वाक़ये, कुछ लोग...





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अगर जो इस राह नहीं होते, तो उस राह होते.
उस राह पे मौसम कुछ अलग होते, कुछ बदले होते.
कहीं तो इस राह के मौसमों से शिकवे बहुत हैं.
कहीं है ढ़ेर सुकून भी और इत्मिनान बहुत हैं.


जिस राह गए नहीं, सुना है बस उसके बारे में... देखा नहीं.
कभी मुस्करा के, कभी घबरा के सोचा है बस उसके बारे में... जिया नहीं.
सोचते हैं अक्सर, एक रोज़, एक निशान पे जो इधर न मुड़ गए होते,
कुछ और होती डगर, कुछ और मंज़र होते.


तब वो हर वाक़या याद आता है,
जो जाने क्यूँ घटा था, बस कुछ उलझा गया था, उससे भला मैं कब जुड़ा था.
तब वो लोग याद आते हैं,
जो जाने क्यूँ मिले थे, लगा था कि अहम थे, वो तो बस भरम थे.


निमित्त, बस निमित्त मात्र घटते हैं कुछ वाक़ये.
बस निमित मात्र मिलते हैं कुछ लोग.
कभी आसान से मुश्किल, कभी मुश्किल से आसान,
सिर्फ राहें बदलवाने भर का संयोग.


कुछ वाक़ये, कुछ लोग...
सड़क पे लगे किसी निशान की तरह, बस सफ़र की दिशा बदल जाते हैं.
जब ज़हन में कभी सवाल आये कि इस राह पर कैसे निकल पड़े थे हम...
महज़ तब ये निशान याद आते हैं.



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